दलबदल – विरोधी कानून

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संदर्भ:

हाल ही में, उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने कहा है, कि ‘दलबदल-रोधी कानून’ (Anti-defection law) की खामियों को दूर करने के लिए इसमें संशोधन करने का समय आ गया है।

चुनौतियां:

‘दलबदल-रोधी कानून’ लागू होने के बावजूद, ‘विधि-निर्माताओं’ का एक राजनीतिक दल से राजनीतिक दूसरे दल में ‘दलबदल’ हमेशा की तरह हो रहा है।

स्पीकर, चेयरपर्सन और कोर्ट भी सालों से दलबदल-रोधी मामलों को घसीट रहे हैं।

मौजूदा कानून में, दल-बदल रोधी मामलों में सदन के सभापति या अध्यक्ष की कार्रवाई के लिए ‘समय सीमा’ के बारे में कोई स्पष्टता नहीं है।

‘दलबदल-रोधी कानून’ के बारे में:

‘दलबदल-रोधी कानून’ (Anti-defection law) भारतीय संविधान की ‘दसवीं अनुसूची’ के अंतर्गत आता है।

संविधान में ‘दसवीं अनुसूची’ को 52 वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 द्वारा शामिल किया गया था थी।

इस क़ानून में उन परिस्थितियों को निर्दिष्ट किया गया है, जिनके तहत, किसी ‘विधि-निर्माताओं’ द्वारा राजनीतिक दल बदलने पर कानून के तहत कार्रवाई की जा सकती है।

क़ानून में, किसी निर्दलीय ‘विधि-निर्माता’ द्वारा चुनाव जीतने के बाद किसी पार्टी में शामिल होने संबंधी परिस्थितियों को भी निर्धारित किया गया है।