मृत्युदंड

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संदर्भ: “मौत की सजा के मामलों में अभियुक्तों को एक ट्रायल जज के समक्ष, उनके ‘अपराध की गंभीरता कम करने वाली परिस्थितियों’ की “सार्थक, वास्तविक और प्रभावी” सुनवाई कैसे और कब की जाए”, इस सवाल को सुप्रीम कोर्ट ने विचार करने के लिए एक संविधान पीठ के पास भेजा है।
महत्वपूर्ण बिंदु:

महत्वपूर्ण अधिकार: भारत के मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली तीन-न्यायाधीशों की खंडपीठ ने कहा कि “मृत्यु की कठोरतम सजा” से बचने के लिए एक आरोपी द्वारा ‘अपराध की गंभीरता कम करने वाली परिस्थितियों’ (Mitigating Circumstances) की प्रस्तुति एक “महत्वपूर्ण अधिकार” है।
दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 354 (3): अदालतों को अधिकतम दंड देने के लिए लिखित में कारण बताना आवश्यक है।
बचन सिंह बनाम पंजाब राज्य (1980) में सुप्रीम कोर्ट का फैसला:

इस फैसले में, किसी मृत्युदंड की सजा केवल “दुर्लभतम” (Rarest of Rare) अपराध के मामले में दिए जाने के सिद्धांत को स्थापित किया गया था, और सजा सुनाते समय अभियुक्तों के संबंध में ‘उत्तेजक’ तथा ‘गंभीरता कम करने वाली’ परिस्थितियों के तुलनात्मक विश्लेषण को अनिवार्य किया गया था।
माची सिंह बनाम पंजाब राज्य मामला (1983):

इस मामले में, सुप्रीम कोर्ट द्वारा “दुर्लभतम” अपराध के सिद्धांत को स्पष्ट किया गया और मौत की सजा के मामलों में कुछ मार्गदर्शक सिद्धांत निर्धारित किए गए।

उत्तेजक या भड़काऊ परिस्थितियों (Aggravating Circumstances) में, अपराध करने का तरीका, अपराध करने का मकसद, अपराध की गंभीरता और अपराध से पीड़ित को शामिल किया गया था।
‘गंभीरता कम करने वाली परिस्थितियों’ (Mitigating Circumstances) में, किसी आरोपी के सुधार और पुनर्वास की संभावना, उसका मानसिक स्वास्थ्य और उसके पिछले जीवन को शामिल किया गया था।