नुआखाई जुहार/ नुआखाई भेटघाट’

99

हाल ही में भारतीय प्रधानमंत्री ने ‘नुआखाई जुहार’ (NuakhaiJuhar) के अवसर पर देश के किसानों को शुभकामनाएँ दी।

यह एक कृषि उत्सव है जिसे ‘नुआखाई पर्व’ (NuakhaiParab) या ‘नुआखाई भेटघाट’ (NuakhaiBhetghat) भी कहा जाता है।

नुआखाई दो शब्दों (नुआ+खाई) से मिलकर बना है जो नए चावल खाने के महत्त्व को दर्शाता है। यहाँ ‘नुआ’ का अर्थ है नया और ‘खाई’ का अर्थ है भोजन।

यह बदलते मौसम के साथ नई फसल का स्वागत करने के लिये पश्चिमी ओडिशा, दक्षिणी छत्तीसगढ़ एवं झारखंड के कुछ क्षेत्रों में मनाया जाने वाला एक प्राचीन त्योहार है।

यह उत्सव गणेश चतुर्थी के एक दिन बाद मनाया जाता है।

इस दिन किसान अन्न की पूजा करते हैं और विशेष भोजन तैयार करते हैं।

ओडिशा के संबलपुर ज़िले की प्रसिद्ध ‘मातृ देवी’ देवी समलेश्वरी (Goddess Samaleswari) को किसान अपनी भूमि से पहली उपज के रूप में कुछ अन्न अर्पित करते हैं।

इसे स्थानीय ओडिया भाषा में ‘बारा मस्सा रे तेरा पर्व’ के नाम से जाना जाता है।

स्थानीय लोगों की मान्यता है कि नुआखाई उत्सव वैदिक काल में आरंभ हुआ था जब ऋषियों ने पंचयज्ञ पर विचार किया, पंचयज्ञ का एक हिस्सा प्रलंबन यज्ञ था जिसमें नई फसलों की कटाई और उन्हें देवी माँ को अर्पित करने का उत्सव मनाया जाता था।

नुआखाई महोत्सव का उद्देश्य देश की आर्थिक प्रगति में कृषि की प्रासंगिकता के बारे में समाज को एक महान संदेश देना है।

इसी प्रकार का त्योहार तटीय ओडिशा में ‘नबन्ना’ नाम से मनाया जाता है। ओडिशा में त्योहारों की जीवंत-संस्कृति है।